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गुरुवार, 8 जनवरी 2009

धारा के साथ ..

धारा के विरुद्ध

चलते-चलते

पता नही ....

किस मोड़ पर

धारा के साथ हो गया

आराम से बहते - रह्ते

आराम की आदत हो गई

पर...

जब...

आँखे खुली तो ..

मेरी आवाज़ की

बुलंदी

ना जाने

कहां खो गई।

समझा

धारा के विरुद्ध और

धारा के बहाव में

आदमी

क्या पाता है

और

खोता है।
शुभ प्रभात....आपका आज का दिन मंगलमय हो

1 टिप्पणी:

  1. सूरज भाई.....धारा के साथ अपन तो नहीं चल सकते....अगरचे धारा ग़लत हो....ये हमारी निजता और आदमियत का सवाल है....बेशक इस करके हमें दिक्कतों का सामना kyun naa karnaa pade.....!! kavita aapne acchi likhi hai....badhaayi....!!kripyaa svikriti ke janjaal ko hataa den naa.....!!

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