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मंगलवार, 2 जून 2009

कचहरी नामा(३)पेशकार से पंगा

बड़ा ही मज़ेदार किस्सा है ये कचहरी का आप को सोच कर हंसी भी आयेगे और चिराग तले अँधेरा भी दिखाई देगा. कचहरी में पेशकार एक नाम है जिससे कई बार वकील भी खौफ खाते है ये सरकारी नौकर है जो किसी भी प्रकार का दया ना करने की कसम खा कर ही अपनी कोर्ट की दिनचर्या की शुरुवात करते है प्रत्येक हजारी पर इनका चढावा फिक्सड होता है चाहे हजारी पर सीनियर वकील साहेब का हस्ताक्षर हो या किसी जूनियर का प्रत्येक हजारी पर मिलने वाली राशि इनकी बपौती होती है शायद ही ऐसा कोई पेशकार हो जिसने चढावा नहीं लिया हो ........ये तो मैंने बताना भूल ही गया की यदि आप कोर्ट में उपस्थित होते है तो हजारी देनी होगी अन्यथा टाइम पिटिसन देना होता है सुबह-सुबह टाइम पिटिसन देख पेशकार किस तरह का मुंह बनाते है इसकी आप कल्पना कीजिए क्योंकि टाइम पिटिसन में पेशकार को चढवा नहीं चढ़ता बल्कि वकील साहेब की जेब से ५ रूपये का टिकट पिटिसन में देना पड़ता है ............मै बात कर रहा था उस मज़ेदार घटना की जब एक केस में कई मुलजिम थे परन्तु सबके सब होशियार उनकी नियत रहती थी की किसी तरह वकील का फीस मार ले इसके लिए सभी एक साथ हाज़िर नहीं होते कोई एक-दो आता बाकी के गायब हो जाते वकील की फीस मार -मार कर इनकी आदत ख़राब हो चुकी अब इनकी नियत पेशकार के चढावा पर आ गई दो डेट पिटिसन पर दे मारी पेशकार बिना चढावा के पूजा पर क्रोधित थे, उसने पुरे केस का स्टडी किया और पाया की मुलजिम उसे वकील की तरह मासूम समझ रहा है अब बारी थी पेशकार की, उनको औकात बताने की...... इस डेट में जैसे ही बिना चढावे के मुलजिम आकर पिटिसन दिए की पेशकार ने कहा रुको तुम लोगों का वारंट निकला हुआ है ...वारंट सुनते ही मुलजिमों की सारी चतुराई धरी की धरी रह गई क्योंकि वारंट का सीधा सा अर्थ मेहमान बन लाल घर की सैर करना होता है जो कोई भी शरीफ आदमी नहीं चाहेगा उन्होंने मासूम स्वर में कहा हमारे वकील ने तो नहीं बताया पेशकार चट बोल उठा वकील को पैसे देते हो .........नहीं न फिर फोकट में कितनी पैरवी करेंगे ......मुलजिम भागे-भागे वकील के पास गए वकील बेचारा सीधा साधा बोले वारंट तो नहीं था पिछली बार भी मैंने पैरवी की थी वकील मुलजिम के साथ पेशकार के पास पहुँच माजरा पूछे तो पेशकार का ज़वाब था आपके मुव्वकिल ने भारत सरकार को उलट दिया है और साथ ही ये भी कहा की ये लोग बिना चढावा के ही दर्शन कर पुण्य पा रहे है इन लोगों को सरकारी मेहमान बनाना चाहता हूँ कह कर इनलोगों के द्वारा दिया गया पिटिसन को दिखाया जिस पर चिपकाया गया कोर्ट फी उल्टा चिपका था जिस कारण कोर्ट फी पर मुद्रित अशोक स्तम्भ उल्टा था मुलजिमों ने पेशकार के वारंट की धमकी की अच्छी खासी कीमत चुकाई और पेशकार से पंगा न लेने की कसम खा अपनी जान बचाई ....चलिए हम मिलते रहेंगे .....अच्छा लगे तो समर्थन कर हौसला बढाइये ,टिप्पणी कीजिये ख़राब हो तो भी टिप्पणी करे कचहरी नामा का सफ़र चलता रहेगा आप भी यात्रा का आनंद लेते रहें

3 टिप्‍पणियां:

  1. न्यायालय में भ्रष्टाचार मंदिर में होता व्यभिचार।
    विश्वासों का टूट रहा है धीरे धीरे सब आधार।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.

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  2. are suraj bhai...aapne baat to sach kahee ...aur shaayad aisaa hai bhee...magar aisaa katai nahin ki koi bhee imaandaar nahin hai....aap kabhi dilli aayein aur tees hajari mein jha jee ke baare mein pata karein...log kehenge wahi jo paise waise nahin leta.....haan magar jyadatar sthiti wahi hai jo aapne kahi...

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  3. आप ने स्थानीय प्रचलन के शब्दों का प्रयोग किया जिन्हें समझने में बाधा पड़ी। पर लगता है किस्सा दस-बीस साल पुराना है। न तो कोई वकील इतना सीधा मिलेगा और न मुलजिमान इतने बनने वाले।

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