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रविवार, 5 अप्रैल 2009

बदल दो हवाओं का रुख



इस दीये की लौ को
बुझने न दो
ये खुद को जला
दूसरो को
रौशनी देती है
इसे रौशन करो
तेज़ आँधियों को बता दो
की
हम
किसी पर्वत से कम नहीं
हमसे टकराओगे
तो खुद चोट पाओगे
हम
वो है
जो हवाओं के रुख को
मोड़ने की क्षमता रखते है



5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुनदर रचना है।बधाई स्वीकारें।

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  2. आशावादी दृष्टिकोण युक्‍त अच्‍छी रचना ... बधाई।

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  3. aap to sachmuch mashaal vale kavi ho gaye ho bhaayisaahab....!!chaliye....ek baar phir diya ham hi jalaate hain....doosron kaa intzaar kyaa karnaa....!!

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